1 इस पर नामात नामक प्रदेश के सोपर ने अय्यूब को उत्तर देते हुये कहा,
2 “इस शब्दों के प्रवाह का उत्तर देना चाहिये।
3 अय्यूब, क्या तुम सोचते हो कि
4 अय्यूब, तुम परमेश्वर से कहते रहे कि,
5 अय्यूब, मेरी ये इच्छा है कि परमेश्वर तुझे उत्तर दे,
6 काश! परमेश्वर तुझे बुद्धि के छिपे रहस्य बताता
7 “अय्यूब, क्या तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रहस्यपूर्ण सत्य समझ सकते हो
8 उसकी सीमायें आकाश से ऊँची है,
9 वे सीमायें धरती से व्यापक हैं,
10 “यदि परमेश्वर तुझे बंदी बनाये और तुझको न्यायालय में ले जाये,
11 परमेश्वर सचमुच जानता है कि कौन पाखण्डी है।
12 किन्तु कोई मूढ़ जन कभी बुद्धिमान नहीं होगा,
13 सो अय्यूब, तुझको अपना मन तैयार करना चाहिये, परमेश्वर की सेवा करने के लिये।
14 वह पाप जो तेरे हाथों में बसा है, उसको तू दूर कर।
15 तभी तू निश्चय ही बिना किसी लज्जा के आँख ऊपर उठा कर परमेश्वर को देख सकता है।
16 अय्यूब, तब तू अपनी विपदा को भूल पायेगा।
17 तेरा जीवन दोपहर के सूरज से भी अधिक उज्जवल होगा।
18 अय्यूब, तू सुरक्षित अनुभव करेगा क्योंकि वहाँ आशा होगी।
19 चैन से तू सोयेगा, कोई तुझे नहीं डरायेगा
20 किन्तु जब बुरे लोग आसरा ढूढेंगे तब उनको नहीं मिलेगा।